सोहराई कला की यात्रा: एक जुनून से जनआंदोलन तक
झारखंड की पारंपरिक कला सोहराई पेंटिंग केवल दीवारों पर बने चित्र नहीं हैं, बल्कि यह एक सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक परिवर्तन की कहानी है। इस कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में डॉ. जयश्री देवी का योगदान अत्यंत प्रेरणादायक है।
एक नई शुरुआत (2002 से सफर)
डॉ. जयश्री देवी की सोहराई कला से जुड़ी यात्रा वर्ष 2002 में शुरू हुई, जब उनका विवाह लोहरदगा जिले में हुआ। पारिवारिक कारणों से उन्हें सिसई और गुमला जैसे क्षेत्रों में रहने का अवसर मिला, जहाँ उन्होंने पहली बार इस प्राचीन कला को करीब से देखा। नवरत्नगढ़ महल में देखी गई सोहराई पेंटिंग्स की गहराई और उनकी हजारों वर्षों पुरानी परंपरा ने उन्हें अंदर तक प्रभावित किया। बचपन से ही कला में रुचि रखने वाली जयश्री देवी ने इसे अपने करियर के रूप में अपनाने का निर्णय लिया।
गांव से जुड़ाव और सीखने की प्रक्रिया
उन्होंने गांव की उन महिलाओं से संपर्क किया, जो पारंपरिक रूप से दीवारों पर चित्र बनाती थीं। उनके साथ मिलकर उन्होंने इस कला को समझा और आगे बढ़ाने की दिशा में काम शुरू किया। यह सिर्फ कला सीखने का नहीं, बल्कि समुदाय के साथ जुड़ने का भी एक प्रयास था।
“स्टंब ट्रस्ट” की स्थापना (2007)
वर्ष 2007 में उन्होंने “Stambh Trust” की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सोहराई कला का पुनरुद्धार करना था। लगातार 2-3 वर्षों की मेहनत के बाद उन्होंने इस कला को बाजार से जोड़ने का प्रयास किया और झारक्राफ्ट के साथ काम शुरू किया।
- लगभग 500 महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया
- सोहराई कला को स्टोल, दुपट्टा, साड़ी और कुर्ती जैसे उत्पादों पर उतारा गया
- महिलाओं की आजीविका के नए अवसर बने
हालांकि, कुछ समय बाद काम में रुकावट आई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
2015: एक बड़ा मोड़
वर्ष 2015 में जब नरेंद्र मोदी हजारीबाग रेलवे स्टेशन आए, तो वहां की सोहराई पेंटिंग्स की उन्होंने अपने कार्यक्रम “मन की बात” में सराहना की।
इस एक उल्लेख ने:
- पूरे देश का ध्यान सोहराई कला की ओर आकर्षित किया
- कलाकारों को नई पहचान और प्रेरणा दी
रेलवे स्टेशनों का सौंदर्यीकरण
इसके बाद जयश्री देवी और उनकी टीम ने झारखंड के विभिन्न जिलों में काम किया और:
- लगभग 150 रेलवे स्टेशनों को सोहराई पेंटिंग से सजाया
- इस योगदान के लिए उन्हें पीयूष गोयल (तत्कालीन रेल मंत्री) द्वारा सम्मानित किया गया
GI Tag और नई पहचान (2022)
लगातार प्रयासों का परिणाम वर्ष 2022 में मिला, जब सोहराई कला को GI Tag (Geographical Indication) प्राप्त हुआ। यह इस कला की पहचान और संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है।
महिला सशक्तिकरण की मिसाल
आज इस पहल से:
- 100+ आदिवासी महिलाएँ जुड़ी हुई हैं
- वे न केवल कला को आगे बढ़ा रही हैं, बल्कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बन रही हैं
जयश्री देवी लगातार स्कूलों, कॉलेजों और संस्थानों में कार्यशालाएं आयोजित कर रही हैं, ताकि नई पीढ़ी इस परंपरा से जुड़ सके।
सोहराई कला की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि अगर जुनून और समर्पण हो, तो एक पारंपरिक कला भी सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है। यह कहानी सिर्फ कला की नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण, संघर्ष और सफलता की है।
