सोहराई: झारखंड की प्राचीन कला और संस्कृति की जीवंत पहचान

झारखंड की सांस्कृतिक विरासत में सोहराई पर्व का विशेष स्थान है। यह पर्व प्राचीन काल से ही यहां के लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है। मुख्य रूप से यह त्योहार दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है और इसे प्रकृति, पशुधन और ग्रामीण जीवन के सम्मान के रूप में देखा जाता है।

दीवारों पर सोहराय पेंटिंग बनाती एक आदिवसी स्त्री (तस्वीर : झारखंड आरएमएसए के वीडियो से साभार)

सोहराई पर्व का महत्व

सोहराई केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि यह प्रकृति और मानव के बीच सामंजस्य का प्रतीक है। इस दिन लोग अपने घरों को साफ करते हैं और मिट्टी से दीवारों को लीपकर उन्हें सुंदर चित्रों से सजाते हैं। खास बात यह है कि इस परंपरा को ग्रामीण महिलाएँ आज भी पूरी श्रद्धा और कला के साथ जीवित रखे हुए हैं।

सोहराय के मौके पर सामूहिक नृत्य करते आदिवासी (तस्वीर साभार : दी न्यूज पोस्ट)

सोहराई पेंटिंग: पारंपरिक कला की पहचान

सोहराई पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी भित्ति चित्रकला (Wall Art)। इन चित्रों में मुख्य रूप से निम्न तत्व देखने को मिलते हैं:

  • पेड़-पौधे
  • पशु-पक्षी
  • प्राकृतिक जीवन के दृश्य
  • लोक संस्कृति के प्रतीक

ये चित्र न केवल सुंदर होते हैं, बल्कि इनमें गहरा संदेश भी छिपा होता है — प्रकृति और सभी जीवों के साथ सह-अस्तित्व का महत्व।

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प्राचीन इतिहास और विरासत

झारखंड के हजारीबाग और बड़कागांव क्षेत्रों में पहाड़ियों की गुफाओं में भी ऐसे चित्र देखने को मिलते हैं, जो इस कला की प्राचीनता को दर्शाते हैं। पत्थरों पर बने ये चित्र आज भी इस बात का प्रमाण हैं कि यह कला हजारों वर्षों से अस्तित्व में है।

चावल के आटे से जमीन पर चित्र बनातीं आदिवासी महिलाएं (तस्वीर साभार : बारुण राजगरिया / ट्राइबल डिजायन फोरम)

प्राकृतिक रंगों का उपयोग

पुराने समय में सोहराई पेंटिंग बनाने के लिए पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता था, जैसे:

  • मिट्टी
  • चारकोल (कोयला)
  • पेड़-पौधों की पत्तियाँ

यह परंपरा पर्यावरण के प्रति जागरूकता और प्रकृति के साथ जुड़ाव को दर्शाती है।

सांस्कृतिक संदेश

सोहराई कला हमें यह सिखाती है कि:

  • सभी जीवों को समान रूप से जीने का अधिकार है
  • प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीना चाहिए

भाईचारा और सह-अस्तित्व समाज की नींव है

कलाकारों की आजीविका सशक्त बनाने के प्रयास

मिट्टी के घरों का पक्के (प्लास्टर किए गए) घरों में परिवर्तन होने के कारण सोहराई कला धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही थी। ऐसे समय में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं के प्रयासों ने न केवल सोहराई पेंटिंग को बचाने में मदद की, बल्कि कलाकारों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में भी सुधार किया।

सोहराई कला के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में जयश्री देवी इंदवार का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। उनके प्रयास इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण हैं कि किस प्रकार एक पारंपरिक कला को महिलाओं के सशक्तिकरण का माध्यम बनाया जा सकता है।

सुश्री इंदवार ने सोहराई पेंटिंग को बढ़ावा देने के लिए कई प्रदर्शनियों का आयोजन किया है। उनके द्वारा आयोजित कार्यशालाओं के माध्यम से झारखंड के विभिन्न जिलों की सैकड़ों महिलाओं को इस कला में प्रशिक्षित किया गया है। उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर राजधानी रांची के सौंदर्यीकरण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके इस उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें रेल मंत्रालय, राज्यपाल तथा जनजातीय संगठनों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

सोहराई पर्व झारखंड की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और कला का एक अद्भुत उदाहरण है। यह न केवल एक उत्सव है, बल्कि एक जीवनशैली है जो हमें प्रकृति के करीब लाती है और हमारी जड़ों से जोड़ती है।

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